RTI अधिनियम 2005 भारत के आम आदमी के हाथों में दिया गया एक शक्तिशाली उपकरण है, जो उसे सत्ता और पारदर्शिता की दीवारों के परे देखने की क्षमता प्रदान करता है। विशेष रूप से ग्रामीण भारत में, जहाँ सरकारी योजनाओं के लिए आवंटित धन अक्सर भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाता है, यह अधिनियम एक न्यायपूर्ण समाज की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित होता है। बिहार के एक छोटे से गाँव में, जहाँ विकास की किरणें धीमी गति से पहुँचती हैं, एक साधारण ग्रामीण ने इस अधिनियम का उपयोग करके प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (PMGSY) में हुए एक बड़े घोटाले का पर्दाफाश किया, और यह साबित कर दिया कि जागरूकता और दृढ़ संकल्प के साथ, कोई भी आम आदमी व्यवस्था को चुनौती दे सकता है और बदलाव ला सकता है।
एक गाँव की कहानी: अधूरी सड़क और बढ़ते सवाल
बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के एक सुदूर गाँव ‘रामपुर’ में रमेश नाम का एक मेहनती किसान रहता था। रमेश, उम्र में पचास के पार, गाँव की हर छोटी-बड़ी बात से वाकिफ रहता था। पिछले साल, गाँव में प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत एक नई सड़क का निर्माण कार्य शुरू हुआ था, जो गाँव को मुख्य सड़क से जोड़ती थी। ग्रामीणों को बड़ी उम्मीद थी कि यह सड़क उनके जीवन को आसान बनाएगी, बच्चों को स्कूल जाने में सुविधा होगी और फसल का उचित मूल्य मिलेगा। लेकिन कुछ ही महीनों में, रमेश और अन्य ग्रामीणों ने देखा कि सड़क की हालत पहले से भी बदतर हो गई थी। सड़क में दरारें आ गई थीं, गिट्टियाँ उखड़ रही थीं, और कुछ हिस्सों में तो केवल मिट्टी डालकर काम खत्म कर दिया गया था।
रमेश के मन में सवाल उठने लगे। उसने देखा था कि सड़क बनाने वाले ठेकेदार ने निचले दर्जे की सामग्री का इस्तेमाल किया था और काम भी जल्दबाजी में निपटाया था। उसके दोस्त और पड़ोसी भी यही बातें करते थे, लेकिन कोई नहीं जानता था कि शिकायत कहाँ की जाए और कैसे की जाए। गाँव के सरपंच और अन्य पंचायत अधिकारी इस मामले पर चुप्पी साधे हुए थे, और गाँव में यह फुसफुसाहट फैलने लगी थी कि सड़क निर्माण में बड़ा घोटाला हुआ है और पंचायत के कुछ लोग भी इसमें शामिल हैं।
जानकारी की तलाश: एक आम आदमी की पहली चुनौती
रमेश ने पहले मौखिक रूप से पंचायत कार्यालय में कई बार अपनी शिकायत दर्ज कराने की कोशिश की। उसने सरपंच से बात करने का प्रयास किया, लेकिन उसे टाल दिया गया। ब्लॉक डेवलपमेंट ऑफिसर (BDO) के कार्यालय में जाने पर भी उसे कोई संतोषजनक उत्तर नहीं मिला। हर जगह उसे केवल बहाने और टालमटोल का सामना करना पड़ा। अधिकारियों के इस रवैये ने रमेश को निराश तो किया, लेकिन उसकी दृढ़ता को कम नहीं किया। उसे विश्वास था कि कहीं न कहीं तो उसे जवाब मिलेगा।
इसी दौरान, रमेश का भतीजा, जो शहर में पढ़ाई कर रहा था, छुट्टियों में गाँव आया। उसने रमेश की परेशानी सुनी और उसे RTI अधिनियम 2005 के बारे में बताया। उसने समझाया कि यह कानून हर नागरिक को सरकारी विभागों से जानकारी मांगने का अधिकार देता है, और अधिकारी 30 दिनों के भीतर जानकारी देने के लिए बाध्य हैं। रमेश पहले तो झिझका, लेकिन जब उसके भतीजे ने उसे प्रक्रिया की सरलता और महत्व समझाया, तो उसे एक नई उम्मीद की किरण दिखी।
RTI अधिनियम 2005: जानकारी मांगने का सरल मार्ग
गाँव के माहौल में, जहाँ कई ग्रामीण अनपढ़ थे और कागजी कार्रवाई से डरते थे, RTI आवेदन करना एक चुनौती लग सकता था। लेकिन रमेश के भतीजे की मदद से, उसने प्रक्रिया को समझा। उन्होंने एक साधारण कागज़ पर आवेदन लिखा। आवेदन में उन्होंने स्पष्ट रूप से यह जानकारी मांगी:
- प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत गाँव रामपुर में बनी सड़क के निर्माण के लिए आवंटित कुल राशि का विवरण।
- इस सड़क के निर्माण के लिए जारी की गई निविदा (Tender) की प्रति।
- ठेकेदार का नाम और पता, जिसे काम सौंपा गया था।
- उपयोग की गई सामग्री की खरीद के बिलों की प्रतियां।
- माप पुस्तिका (Measurement Book) की प्रतियां, जिसमें कार्य की प्रगति और सामग्री के उपयोग का विवरण होता है।
- सड़क की गुणवत्ता जांच रिपोर्ट (Quality Check Report)।
उन्होंने यह आवेदन संबंधित पब्लिक इंफॉर्मेशन ऑफिसर (PIO) को संबोधित किया, और इसके साथ केवल 10 रुपये का पोस्टल ऑर्डर संलग्न किया। रमेश ने आवेदन की एक प्रति अपने पास सुरक्षित रख ली।
जब सूचना की शक्ति सामने आई: RTI का असर
रमेश ने आवेदन डाक द्वारा भेजा। 30 दिन बीत जाने पर भी उसे कोई जवाब नहीं मिला। यह RTI अधिनियम का उल्लंघन था। रमेश के भतीजे की सलाह पर, उसने प्रथम अपीलीय प्राधिकारी (First Appellate Authority) के पास एक अपील दायर की, जिसमें उसने बताया कि उसे निर्धारित समय सीमा में जानकारी नहीं मिली है। इस बार, अपील दायर होने के बाद, संबंधित अधिकारियों में हड़कंप मच गया। उन्हें पता था कि यदि वे अभी भी जानकारी नहीं देते हैं, तो मामला राज्य सूचना आयोग तक पहुँच सकता है, जहाँ उन पर जुर्माना भी लग सकता है।
अंततः, रमेश को जानकारी मिली। जो दस्तावेज़ उसे भेजे गए, उनमें कई चौंकाने वाले खुलासे थे। माप पुस्तिका में दर्ज कार्य और हकीकत में हुए कार्य में जमीन-आसमान का अंतर था। पुराने बिलों को नए बिलों के रूप में दिखाया गया था, घटिया सामग्री को उच्च गुणवत्ता वाली बताकर अधिक पैसे वसूले गए थे, और कुछ जगहों पर तो कागजों पर काम पूरा दिखाया गया था जहाँ असल में कुछ हुआ ही नहीं था। आवंटित राशि का एक बड़ा हिस्सा अधिकारियों और ठेकेदार की मिलीभगत से गबन कर लिया गया था।
घोटाले का पर्दाफाश और न्याय की ओर पहला कदम
इन दस्तावेजों के साथ, रमेश ने स्थानीय समाचार पत्रों और टीवी चैनलों से संपर्क किया। मीडिया ने इस खबर को प्रमुखता से छापा। गाँव में भी हलचल मच गई। ग्रामीणों ने रमेश का समर्थन किया और उसके साथ खड़े हुए। RTI के माध्यम से मिली सटीक जानकारी ने घोटाला करने वालों को बेनकाब कर दिया। सार्वजनिक दबाव और मीडिया के ध्यान के कारण, जिलाधिकारी (District Magistrate) को इस मामले की जाँच का आदेश देना पड़ा।
जाँच में रमेश द्वारा लगाए गए आरोप सही पाए गए। कई अधिकारियों और ठेकेदार के खिलाफ कार्रवाई की गई। कुछ को निलंबित किया गया, तो कुछ के खिलाफ कानूनी कार्यवाही शुरू की गई। सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि गाँव में नई सड़क के निर्माण के लिए दोबारा निविदा जारी की गई, और इस बार काम की निगरानी ग्रामीणों द्वारा भी की गई, जिससे गुणवत्ता सुनिश्चित हो सकी।
निष्कर्ष: लोकतंत्र में जनभागीदारी का प्रतीक
रमेश जैसे आम आदमी की यह कहानी दिखाती है कि RTI अधिनियम 2005 कितना शक्तिशाली हो सकता है। यह केवल कागज़ का एक टुकड़ा नहीं, बल्कि लोकतंत्र में जनभागीदारी और जवाबदेही का प्रतीक है। बिहार के रामपुर गाँव का यह अनुभव बताता है कि जब नागरिक जागरूक होते हैं और अपने अधिकारों का उपयोग करते हैं, तो वे भ्रष्टाचार पर प्रहार कर सकते हैं, व्यवस्था को पारदर्शी बना सकते हैं और अपने समुदायों में वास्तविक बदलाव ला सकते हैं। RTI अधिनियम ने रमेश को न केवल एक सड़क घोटाला उजागर करने में मदद की, बल्कि पूरे गाँव में एक नई आशा और विश्वास पैदा किया कि उनकी आवाज मायने रखती है। यह अधिनियम हमें सिखाता है कि सूचना की शक्ति, जब सही हाथों में हो, तो बड़े से बड़े अन्याय को भी चुनौती दे सकती है और अंततः न्याय की जीत सुनिश्चित कर सकती है।



