लोक सुचना पदाधिकारी – बिहार राज्य सुचना आयोग (चोर – चोर, मौसेरे भाई)

बिहार में आरटीआई का सच: ढाई साल बाद सुनवाई, लेकिन पीआईओ पर जुर्माना तक नहीं!
सूचना आयोग और अधिकारियों की ‘मिलीभगत’ ने पारदर्शिता के अधिकार को बनाया मज़ाक


📍 भूमिका: एक आरटीआई एक्टिविस्ट की जंग

जीतेन्द्र कुमार, दरभंगा के हनुमान नगर प्रखंड के एक सामाजिक कार्यकर्ता और आरटीआई एक्टिविस्ट, ने कभी सोचा भी नहीं था कि सरकारी दावों की सच्चाई जानने की कोशिश उन्हें एक ऐसी जंग में झोंक देगी, जहाँ न्याय पाने के लिए उन्हें 913 दिन (लगभग ढाई साल) इंतज़ार करना पड़ेगा। उनकी लड़ाई सिर्फ सूचना के लिए नहीं, बल्कि बिहार सरकार के उस दावे को खारिज करने के लिए थी, जिसमें उनके प्रखंड की 14 पंचायतों को ‘खुले में शौच मुक्त’ (ODF) घोषित किया गया था।


🔍 क्या है पूरा मामला?

1. आरटीआई आवेदन और सवाल

  • तारीख: 5 दिसंबर 2022
  • पता: लोक सूचना अधिकारी-सह-ब्लॉक विकास पदाधिकारी, हनुमान नगर, दरभंगा
  • माँगी गई जानकारी: लोहिया स्वच्छ बिहार अभियान (ODF-I) के तहत निम्नलिखित 14 पंचायतों के ODF घोषित किए जाने से जुड़े सभी दस्तावेज़, जाँच रिपोर्ट, और स्वीकृति प्रक्रिया की कॉपियाँ:
    • अरैला, डीहलही, गोडाइपट्टी, गोधैला, गोढियारी, मोरो, नरसरा, नेयाम छतौना, पंचोभ, पतोरी, रामपुर डीह, रुपौली, सिनुआरा एवं थलवारा
  • कारण: जीतेन्द्र का कहना है कि इन पंचायतों में आज भी खुले में शौच जारी है, लेकिन सरकारी कागज़ात में इन्हें ODF बताया जा रहा है।

2. जवाब न मिलना और शिकायत

  • 30 दिनों तक कोई जवाब न मिलने पर, जीतेन्द्र ने 17 मार्च 2023 को बिहार राज्य सूचना आयोग (SIC) में धारा 18(1) के तहत शिकायत दर्ज कराई।
  • शिकायत में PIO पर आरटीआई अधिनियम की अवहेलना का आरोप लगाते हुए जुर्माना और अनुशासनात्मक कार्रवाई की माँग की गई।

⏳ 2.5 साल का सुनवाई इंतज़ार: आयोग की ‘सुस्त’ रफ़्तार

जीतेन्द्र को आयोग से पहली सुनवाई की तारीख मिलने में 913 दिन लग गए। इस दौरान:

  • PIO का पद तीन अलग-अलग अधिकारियों के पास रहा:
    • डॉ. अरुण कुमार सिंह (अप्रैल 2022 – फरवरी 2023)
    • सुश्री नेहा कुमारी (फरवरी 2023 – जुलाई 2023)
    • श्री मनीष कुमार (जुलाई 2023 – वर्तमान)
  • किसी ने भी आरटीआई का जवाब देने की जहमत नहीं उठाई।
  • आयोग ने बिना किसी कारण बताए मामले को लटकाए रखा।

🏛️ 4 अगस्त 2025 की सुनवाई: एक तमाशा!

जब आखिरकार 4 अगस्त 2025 को सुनवाई हुई, तो जितेंद्र के सामने एक निराशाजनक सच सामने आया:

  • आयोग ने जीतेन्द्र को अपना पक्ष पूरी तरह से रखने का मौका नहीं दिया।
  • PIOs ने बचाव के लिए कहा: “पुराने अधिकारी रिटायर/तबादला हो गए हैं, इसलिए जवाब नहीं दे सके।”
  • आयोग ने धारा 20(1) के तहत जुर्माना लगाने से इनकार कर दिया और मामले को आगे के लिए टालते हुए 17 अक्टूबर 2025 की नई तारीख दे दी।

📜 कानूनी पहलू: आयोग ने क्यों की गलती?

  • आरटीआई अधिनियम कहता है कि यदि PIO तबादला हो जाता है, तो नया PIO लंबित आवेदनों का जवाब देने के लिए उत्तरदायी है।
  • PIO बिना किसी वजह के जवाब न देने पर ₹250 प्रतिदिन के हिसाब से जुर्माना लगाया जा सकता है (अधिकतम ₹25,000)।
  • अनुशासनात्मक कार्रवाई की भी सिफारिश की जा सकती है।

लेकिन आयोग ने इनमें से कोई भी कदम नहीं उठाया!


🤝 PIOs और SIC के बीच ‘मौन समझौता’?

जीतेन्द्र का मानना है कि आयोग और PIOs के बीच एक अनौपचारिक गठजोड़ है:

  • आयोग PIOs पर कार्रवाई करने से बचता है क्योंकि दोनों सरकारी machinery का हिस्सा हैं।
  • इससे PIOs को संरक्षण मिलता है और वे आरटीआई आवेदनों को अनदेखा करते रहते हैं।
  • आम आदमी का विश्वास टूटता है और पारदर्शिता का अधिकार मज़ाक बनकर रह जाता है।

 ⏳आखिर 2.5 साल क्यों लगे?

लेकिन सवाल यह है कि आखिर 2.5 साल क्यों लगे?
इसका जवाब बहुत सरल है – आवेदनों की भरमार

और आवेदन इतने ज़्यादा क्यों हैं?
इसका कारण यह है कि कोई भी आवेदक राज्य लोक सूचना अधिकारी (SPIO) से संतुष्ट नहीं है या उन्हें समय पर जवाब नहीं मिलता।

और आवेदकों को SPIO से जवाब क्यों नहीं मिलता?
इसकी वजह भी स्पष्ट है – राज्य सूचना आयोग (SIC) कमज़ोर है और वह SPIO पर कभी भी सख्त जुर्माना या अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं करता

और आखिर SIC ऐसी कार्रवाई क्यों नहीं करता?
इसका सच और भी कड़वा है – “चोर-चोर मौसेरे भाई” वाला सिद्धांत। (दोनों ही सरकारी सेवाओं का हिस्सा हैं)।

इसलिए, SIO और PIO के बीच एक अनकहा रिश्ता काम करता है। वे एक-दूसरे को बचाते हैं, जबकि उनकी ज़िम्मेदारी जनता के प्रति जवाबदेही तय करना होनी चाहिए। यह कड़वा सच है कि आरटीआई अधिनियम जैसा शक्तिशाली कानून भी सरकारी अधिकारियों की आपसी सहमति के आगे बेकार साबित हो रहा है।

जब तक सूचना आयोग जैसी संस्थाएं पारदर्शिता और जवाबदेही को गंभीरता से नहीं लेंगी, तब तक आम नागरिक का विश्वास बहाल नहीं हो सकता।


💔 जीतेन्द्र का दर्द: “क्या मैं हार मान लू अब ?”

जितेंद्र कुमार अब थक चुके हैं। उनका कहना है:

“मैंने सिर्फ सच जानना चाहा था, लेकिन सिस्टम ने मुझे निराश किया। अगर आयोग ही PIOs का साथ देगा, तो RTI का कानून बेकार है। मैं 17 अक्टूबर को सुनवाई में शामिल नहीं होने की सोच रहा हूँ, क्योंकि मुझे कोई उम्मीद नहीं बची है।”


✅ निष्कर्ष: क्या है समाधान?

  1. सूचना आयोग की स्वतंत्रता: आयोग को राजनीतिक दबाव से मुक्त करना होगा।
  2. जुर्माना लगाने की कड़ाई: हर मामले में धारा 20(1) और 20(2) का पालन करना होगा।
  3. समयबद्ध सुनवाई: 30 दिनों के भीतर शिकायतों का निपटारा करना होगा।
  4. जन जागरूकता: लोगों को आरटीआई के इस्तेमाल के लिए प्रोत्साहित करना होगा।
  5. अधिकारी जागरूकता:सरकार को आरटीआई के प्रति समवेदंसील एवं सम्मान रखने के लिए समय समय पर अभियान चलाना चाहिए।

अगर यही हाल रहा, तो आरटीआई अधिनियम जल्द ही एक कागज़ी कानून बनकर रह जाएगा।

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